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क्या आपके टूथपेस्ट में प्लास्टिक है ?

साइंस डेस्क : पर्यावरण इंजीनियर मार्टिन लोएडर जब भी अपने दांत साफ करते, उनकी जबान पर एक सफेद सी परत रह जाती. मार्टिन को अंदाजा तो था कि यह क्या हो सकता है लेकिन उन्होंने अच्छे से पता लगाने का सोचा. उन्होंने ट्यूब का टूथपेस्ट दस माइक्रोमीटर पतली जाली में डाला. एक माइक्रोमीटर मिलिमीटर का 100वां हिस्सा होता है. जाली पर जो बचा, उसे उन्होंने माइक्रोस्कोप के नीचे देखा. उन्हें दिखी, सुंदर गोल प्लास्टिक की बूंदे.

टूथपेस्ट में प्लास्टिक का क्या काम?

माइक्रोप्लास्टिक के ये कण अक्सर पीलिंग प्रोडक्ट में काम में आते हैं, जैसे चेहरा साफ करने वाला जेल. इससे सफाई का इफेक्ट आता है और त्वचा पर जमी डेड स्किन निकल जाती है. प्लास्टिक के ये कण नर्म होते हैं और इसलिए इन्हें टूथपेस्ट में इस्तेमाल किया जाता है. क्योंकि इससे मसूढ़ों को नुकसान हुए बिना सफाई की जा सकती है. इतना ही नहीं ये माइक्रोप्लास्टिक लिपस्टिक, मस्कारा और मेकअप उत्पादों में भी होती है. अगर आप अपने स्क्रब, फाउंडेशन या टूथपेस्ट पर लिखी जानकारी पढ़ेंगे तो उसमें पोलीएथिलीन (पीई), पोलीप्रॉपिलेन (पीपी) जैसा कुछ लिखा मिलेगा. ये कुछ और नहीं, प्लास्टिक ही है. यानि ये कोई राज नहीं. लेकिन कॉस्मेटिक कंपनियां इस मुद्दे पर बात करना पसंद नहीं करती.
वहीं कुछ कंपनियां दावा करती हैं कि वे आने वाले दिनों में माइक्रोप्लास्टिक का विकल्प तैयार करेंगी और उत्पादन में धीरे धीरे बदलाव करेंगी. लॉरिएल ने डॉयचे वेले को ईमेल में बताया कि 2017 तक वह अपने उत्पादों से माइक्रोप्लास्टिक हटा देगा. नीवीया बनाने वाली कंपनी बायर्सडॉर्फ ने भी वादा किया है कि 2015 के अंत प्लास्टिक किसी उत्पाद में नहीं मिलेगा.


खाद्य चक्र में मिला प्लास्टिक

क्योंकि मुद्दा सिर्फ उत्पादों में प्लास्टिक के इस्तेमाल का नहीं है. ये बूंदे घुलनशील नहीं होते और इसलिए पानी से होते हुए मिट्टी, नदी और समंदर तक पहुंच जाते हैं. मछलियां इन्हें निगल लेती हैं और इंसान मछलियां खाता है.

मार्टिन लोएडर 2011 से माइक्रोप्लास्ट नाम के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं और उत्तरी और बाल्टिक सागर में प्लास्टिक के इन कणों के प्रदूषण के बारे में शोध कर रहे हैं, ताकि जरूरत होने पर जर्मनी का शिक्षा और शोध मंत्रालय इस पर रोक लगाने के बारे में विचार करे. पर्यावरण संस्था नाबू के मुताबिक उत्तरी सागर में सालाना 20,000 टन प्लास्टिक फेंका जाता है. माइक्रोप्लास्टिक की समस्या यह है कि वह पानी में मिले हुए जहरीले केमिकल को आकर्षित करता है और उनसे मिल कर जहरीला कॉकटेल बना लेता है. फिर मछलियां इसे खाती हैं और इन मछलियों के साथ ये प्लास्टिक हमारी प्लेट में आ जाता है.

माइक्रोप्लास्टिक से निबटने के लिए वालेडा नाम की कंपनी अब मोम का इस्तेमाल करने लगी है. वहीं कई अन्य कंपनियां टूथपेस्ट में सिलिका, सोडियम और कैल्शियम कार्बोनेट का इस्तेमाल कर रही हैं.

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चंद्रयान 2 की लांचिंग का काउंटडाउन जारी,  दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला होगा पहला यान 

नई दिल्ली - देश ले लिए एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करने जा रहे इसरो का महत्वपूर्ण मिशन चंद्रयान 2  लांचिंग के लिए तैयार है , इसके लिए काउंटडाउन शुरू हो गया है। चंद्रयान 2  दक्षिणीं ध्रुव पर उतरने वाला पहला चंद्रयान होगा अब तक जितने भी यान चाँद पर गए हैं वह सब उत्तरी ध्रुव की पड़ताल करने तक सीमीत रहे हैं। 15 जुलाई तड़के 2 बजकर 51 मिनट पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन केंद्र से चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग होगी. बताया जा रहा है जा रहा है कि 6 सितंबर को यह चांद की सतह पर लैंड करेगा, यह पहली बार है जब भारत चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करवाएगा।  
इससे पहले भारत ने चंद्रयान-1 के दौरान चंद्रमा पर मून इंपैक्ट प्रोब (एमआईपी) उतारा था, लेकिन इसे उतारने के लिए नियंत्रित ढंग से चंद्रमा पर क्रैश करवाया गया था, इस बार विक्रम (लैंडर) और उसमें मौजूद प्रज्ञान (छह पहिये का रोवर) चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करवाएंगे.


दक्षिणी ध्रुव पर करेगा लैंड


चंद्रयान-2 दुनिया का पहला ऐसा यान होगा, जो चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा, चांद का यह हिस्सा वैज्ञानिकों के लिए अब तक अनजान बना हुआ है,  बाकी हिस्से की तुलना में ज्यादा छाया होने की वजह से इस क्षेत्र में बर्फ के रूप में पानी होने की संभावना ज्यादा है,वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस हिस्से में भविष्य में बेस कैंप बनाए जा सकेंगे, ऐसे में चंद्रयान-2 का महत्व पूरी दुनिया के लिए बढ़ जाता है। बताते चलें कि चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं, चंद्रमा पर हर दिन तापमान घटता-बढ़ता रहता है, लेकिन दक्षिणी ध्रुव पर तापमान में ज्यादा बदलाव नहीं होता, यही कारण है कि वहां पानी मिलने की संभावना सबसे ज्यादा है।  

 

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ट्राई के नियमों के ऊपर है वोडाफोन-आईडिया

वोडाफोन व आईडिया के मर्ज होने के बाद उपभोक्ताओं के लिए बढ़ी परेशानियां

रायबरेली - देश भर में आइडिया व वोडाफोन के संविलयन के बाद सबने सोचा था कि आईडिया और वोडाफोन अपने उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं प्रदान करेगा मगर इसके उलट आईडिया की सेवाएं और खराब होती जा रही हैं।उपभोक्ताओं को सुविधाएं मिले इसके लिए ट्राई के बहुत कठोर नियम हैं। समस्या समाधान के लिए समय सीमा भी तय है। जिसमे कम्पलशेसन तक की व्यवस्था है, लेकिन इन कम्पनियों की मनमानी ने आदी बन चुके आम उपभोक्ताओं का जीना मुश्किल कर रखा है। सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र व वीवीआईपी जनपद रायबरेली में शहरी क्षेत्र में आईडिया उपभोक्ताओं को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है वहीं ग्रामीण क्षेत्र में भी आईडिया की सुविधाएं अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। आईडिया की बदतर सुविधाओं की रोजाना शिकायते हो रही है। और इनमें सुधार न आने पर अब उपभोक्ता सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने में लगे हैं।

शहर क्षेत्र के तेलियाकोट निवासी यामीन और असलम ने बताया कि हम लोगो का छोटा व्यवसाय है ज्यादा पैसे नही है। आम लोगो के ऑनलाइन रेलवे/हवाई जहाज के टिकट बुक कर के दो पैसे कमा रहे हैं जिससे किसी तरह परिवार का पेट भरता है। किंतु आईडिया के नेटवर्क की समस्या के चलते अक्सर पैसे कट जाते हैं और टिकट भी नही बुक होता है। जो काफी दिन बाद वापस आता है। बाद में खाते में पैसे न होने से दूसरे टिकट नही बुक हो पाते हैं जिससे व्यवसाय कुछ महीनों से चौपट हो गया है। सत्य नगर निवासी सुरेश यादव, मृत्युंजय मिश्र ने भी न्यूज़ प्लस से आईडिया के नेटवर्क के बारे में बात करते हुए बताया कि उनके बच्चों को लेकर बारिश में जब वो स्कूल जाते है तो स्कूल बंद होने का मैसेज दोपहर में उनके मोबाइल पर आ पाता है। ऐसे में दुबारा बच्चो को लाने की कसरत उन्हें रोज करनी पड़ रही है वही दूसरे सह गार्जियनो के एयरटेल और जिओ के मोबाइल पर वही मैसेज सुबह ही आ जाते हैं।

तिलकनगर निवासी लक्ष्मी नारायण शुक्ल ने बताया कि हाल ही में उन्होंने अपना नम्बर पोर्ट करवा कर किसी तरह इस समस्या से निजात पाई है। मलिकमऊ निवासी शिवम भदौरिया, वरिष्ठ पत्रकार रोहित मिश्र और सौरभ शुक्ला ने भी नेटवर्क में बात न हो पाने और समाचार संकलन में समस्या होने की बात की। इन लोगो ने आईडिया को चेतावनी देते हुए नेटवर्क सुधारने की बात की है। शहर के एक अन्य व्यवसायिक संस्था के अधिकारी किशन मौर्य ने बताया कि संस्था में चालीस से अधिक सीयूजी पोस्टपेड नम्बर चल रहे है वो सभी सिम कार्ड को पोर्ट कराकर कम्पनी बदलने पर विचार कर रहे हैं। 

जनपद के ही पत्रकारपुरम निवासी महेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि उनके आईडिया पोस्टपेड नम्बर पर पहले नेटवर्क सम्बन्धी समस्या हुई मगर शिकायत के बाद भी अब तक कोई हल नहीं निकला। प्रदेश से बाहर रहने के दौरान अचानक आईडिया का नम्बर बन्द हो गया, और लगातार कई दिनों तक उसमे सिग्नल नही आने से महेंद्र को न सिर्फ व्यवसायिक नुकसान हुआ, बल्कि मोबाइल न काम करने से मोबाइल बैंकिंग जैसी कई समस्याओं का सामना भी करना पडा। उनके मुताबिक उन्होंने कई बार जनपद में खुले आईडिया केयर मा गायत्री इंटरप्राइजेज में भी शिकायत करवाई। जिसमे इंटरप्राइजेज के प्रोपराइटर अभय श्रीवास्तव ने अपने उच्चाधिकारियों को ईमेल द्वारा शिकायत भेजी।

न्यूज़ प्लस से अभय श्रीवास्तव ने बताया कि आईडिया और वोडाफोन अब एक ही कम्पनी समझी जाएगी और जल्द ही बेहतर नेटवर्क उपभोक्ताओं को दिया जाएगा। अभय की माने तो आईडिया-वोडाफोन नेटवर्क जल्द ही नम्बर एक नेटवर्क होगा। 

लेकिन इनके दावे के विपरीत उपभोक्ताओं की माने तो इन समस्याओं की मूल जड़ आईडिया और वोडाफोन का एक होना है। इनके क्षेत्र में कार्य कर रहे इंजीनियर एक दूसरे पर जिम्म्मेदारी थोप कर भाग खड़े होते हैं। दोनों कम्पनियों के लापरवाह इंजीनियरों ने ही व्यवस्था ध्वस्त करने में अहम भूमिका निभाई है। आईडिया में तैनात बेहद लापरवाह हार्डवेयर इंजीनियर पंकज ने अब तक शिकायत निस्तारण के नाम पर सिर्फ खाना पूर्ति ही कि है जिससे समस्या समाधान के बजाय बढ़ती गई और हालात ये हो गए हैं। उपभोक्ताओ की लाखों मिन्नतों के बाद टालमटोल कर अधूरे समाधान से अपनी पीठ थपथपाने वाले पंकज ने आईडिया के नेटवर्क को शायद डुबोने का जिम्मा उठा रखा है। हार्डवेयर इंजीनियर पंकज से न्यूज़ प्लस ने सम्पर्क करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नही हो सकी।

 इन लोगो की तरह रायबरेली में हजारों की संख्या में ऐसे उपभोक्ता हैं जो लम्बे समय से आईडिया के उपभोक्ता रहे हैं मगर अब हो रही समस्याओं के चलते कम्पनी बदलने पर विचार करने लगे हैं, मगर आईडिया की तरफ से अब भी शिकायतों पर कार्यवाही की कोई पहल नही की जा रही है।

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अपने बच्चों पर रखे नज़र, ऑनलाइन गेम ले सकते है जान

टेक प्लस : एक समय वह भी था जब बच्चों को घर से बाहर खेलने जाने के लिए मना किया जाता था। दिनभर घर से बाहर रहकर खेलने के लिए उन्हें डांट भी पड़ती थी लेकिन अब समय बदल गया है। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि बच्चे खेलने के लिए घर से बाहर ही नहीं निकल रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ऑनलाइन वीडियो गेम और स्मार्टफोन है। वीडियो गेम खेलने वाले स्मार्टफोन सात-आठ हजार रुपये तक में आसानी से मिल रहे हैं। वहीं गूगल प्ले-स्टोर पर मुफ्त मोबाइल गेम भी मिल जाते हैं। 

दरअसल, ऑनलाइन वीडियो गेमिंग का बाजार बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है इसी के साथ बढ़ रहा है इसका दुष्परिणाम। कई वीडियो गेम्स बच्चों के लिए बेहद ही खतरनाक साबित हो रहे हैं। ब्लू व्हेल जैसे गेम्स की वजह से कई मौतें भी हो चुकी हैं। आइए जानते हैं कुछ वीडियो गेम्स के बारे में जो बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं, उन्हें हिंसक बना रहे हैं और यहां तक की जान देने के लिए भी उकसा रहे हैं।

1. ब्लू व्हेल

ब्लू व्हेल गेम का नाम तो आपने सुना ही होगा। यह गेम साल 2017-18 में काफी लोकप्रिय हुआ था। इसमें टास्क पूरा करने के लिए कई बच्चों ने आत्महत्या तक की है। साल 2017 में इस गेम की वजह से रूस में 130 से अधिक बच्चों की मौत हुई थी, वहीं भारत में करीब 100 बच्चों ने मौत को गले लगाया था। बाद में इस गेम को बनाने वाले फिलिप बुदेकिन (Phillip Budeikin) को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

पुलिस हिरासत में फिलिप ने बताया कि उसने यह गेम उन लोगों के लिए बनाया जो लोग जीना नहीं चाहते। खास बात यह थी कि यह गेम गूगल प्ले-स्टोर या एपल के एप स्टोर पर नहीं था, बल्कि इसे इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिंक के जरिए डाउनलोड कराया जा रहा था। बाद में इंस्टाग्राम ने भी इस गेम को अपने प्लेटफॉर्म पर बंद कर दिया था। हालांकि पिछले साल से इस गेम को लेकर कोई रिपोर्ट सामने नहीं आई है, लेकिन यह गेम किसी अन्य नाम से अभी मौजूद है। गूगल पर blue whale game other names भी सर्च किया जा रहा है।

ब्लू व्हेल गेम में दिए जाते थे ऐसे टास्क

1. वेकअप एट 4.30 मॉर्निंग- सुबह 4 बजे उठकर हॉरर फिल्में देखने और उसकी फोटो क्यूरेटर को भेजने को कहा जाता था।
2. हाथ पर ब्लेड से ब्लू व्हेल बनाएं- ब्लेड से हाथ पर फोटो उकेरने के बाद उसे क्यूरेटर को भेजने को कहा जाता था।
3. नसें काटना- गेम में एक चैलेंज हाथ की नसों को काटकर उसकी फोटो भेजने वाला भी था।
4. छत से कूदना- क्यूरेटर यूजर्स को सुबह छत से छलांग लगाने को भी कहता था।
5. चाकू से काटना- इस गेम में एक टास्क व्हेल बनने के लिए तैयार होना था। इसमें फेल होने पर हाथ पर चाकू के कई वार करने होते थे और पास होने पर पैर पर ब्लेड से YES उकेरना होता था।
6. म्यूजिक सुनना- क्यूरेटर यूजर्स को म्यूजिक भेजता है जो सुसाइड करने और खुद को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाने वाले होते थे।
7. सुसाइड- गेम के 50वें और अंतिम टास्क में सुसाइड करने का टास्क दिया जाता था।

2. पास आउट चैलेंज

पास आउट चैलेंज गेम चोकिंग गेम (Choking Game) के नाम से भी जाना जाता है। यह गेम बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। इसमें दो-तीन बच्चे शामिल होते थे और एक-दूसरे का गला घोंटते थे। ऐसे में ऑक्सीजन ना मिलने की स्थिति में उनकी मौत हो रही थी। कई बार बच्चे बहोश होकर गिर भी जाते थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका में हर साल इस गेम की वजह से करीब 1,000 मौतें होती हैं। इसमें शामिल बच्चों की पहचान उनकी हरकतों से की जा सकती है। जैसे, यदि कोई बच्चा अपनी गर्दन ढंककर रह रहा है तो संभव है कि वह इस गेम को खेल रहा है। इसके अलावा यदि बच्चों की गर्दन पर किसी प्रकार का कोई निशान नजर आए तो आपको सतर्क हो जाने और उस पर नजर रखने की जरूरत है।

3. PUBG मोबाइल

प्लेयर्स अननोन बैटल ग्राउंड (Players Unknown Battle Ground) के नाम से मशहूर इस पबजी गेम को भारत में बंद करने की मांग चल रही है। यह गेम बहुत ही कम समय में लोकप्रिय हुआ है। गुजरात में इस गेम पर एक महीने के लिए प्रतिबंध भी लगा था और इस दौरान गेम खेलने के आरोप में 16 लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी। डॉक्टर्स के मुताबिक पबजी गेम युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रहा है और साथ ही इस गेम को खेलने के बाद बच्चों में हिंसक प्रवृति भी पनप रही है। इसी साल मई में मध्यप्रदेश में पबजी गेम में हार जाने के बाद एक 16 साल के बच्चे की मौत हार्ट अटैक से हो गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि वह पिछले 6 घंटे से पबजी खेल रहा था।

4. साल्ट एंड आइस चैलेज

यह गेम भी ब्लू व्हेल की तरह खुद को नुकसान पहुंचाने वाला है। इस गेम में बच्चों को टास्क दिया जाता है कि वह शरीर के किसी हिस्से पर नमक रखें और उसके ऊपर से बर्फ रखें। ऐसे में नमक के कारण बर्फ तेजी से पिघल जाता है और वह जगह जल जाती है। इस गेम के कारण कई बच्चों के हाथ जल गए थे और कईयों को जलन की समस्या हो गई थी।